
मां के लिए मै क्या लिख सकता,
मैं मां की ही लिखावट हूँ।
तुझसे ही अस्तित्व जुड़ा माँ,
तेरी हूबहू बनावट हूँ।।
धरनि जैसा धैर्य है तेरा,
बन क्षमाशील सह लेती हो।
रखती नहि मन में बैर द्वेष,
ममता की छांव ही देती हो।।
बन बच्चों की ढाल तुम्ही,
बच्चों के हित अड़ जाती हो।
तभी जग में प्रथम शिक्षिका,
और रक्षिका कहलाती हो।।
बांध नहीं पाते है क्षणभर,
जगती के संबंध ये सारे।
जब भी कोई विपदा आती,
सर्व प्रथम माँ तुम्हे पुकारे।।
तुम हो तो माँ खुशियां सारी,
तुम से है माँ घर की शोभा,
तेरे बिन नहीं घर में रौनक,
न वैभव खुशी घर में आभा।।
कितने कष्ट सहे माँ तुमने,
रखी सजाकर घर फुलवारी,
जितना भी करु अदेय रहूंगा,
हर स्वांस है ऋणी तुम्हारी।।
प्रेम समर्पण भाव में डूबी,
तुम सम न करुणामयी दूजा।
माँ तुम हो ईश्वर से बढ़कर,
करु प्रथम माँ तेरी पूजा।।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश













