
मेरी मम्मी जिसे अब मैं माँ कहने लगी हूं,
पता नहीं क्यों पर कहने लगी हूं,
शायद अब वो श्रृंगार नहीं करती है तो मुझे माँ जैसी लगने लगी हैं,
अब माथे पर लाल बिंदी नहीं लगाती, बालों में लाल फीते की जगह अब जुड़े ने ले ली हैं,
झुर्रियों वाला चेहरा अब मुझे अच्छा लगने लगा हैं,
उनके बालों की सफेदी अब मुझे लुभाने लगी हैं,
अब रसोई में कम सोफे पर बैठी ज्यादा नजर आने लगी है,
हर वक्त काम करने वाले हाथ अब थोड़े कंपकपाने लगे हैं,
अब हल्की सी भी उनकी तबियत खराब मुझे डराने लगी हैं,
दिल बैठ सा जाता हैं जब वो ये कहती है अब कितना जीना हैं,
कानों से कम सुनाई और आंखों से भी थोड़ा कम नजर आने लगा हैं,
लेकिन आज भी मेरी आवाज सुनकर बता देती है कि मुझे कोई बात परेशान कर रही हैं,
आज भी चेहरा देखकर मेरी आँखें पढ़ लेती हैं और मेरी परेशानी का हल बता देती हैं,
कितना मुश्किल होता है अपनी माँ को यूं उम्र के पड़ाव में ढलते देखना,
जो हाथ कभी काम करते थकते नहीं थे वहीं हाथ अब सहारा ढूंढने लगे हैं,
मेरी मम्मी अब कुछ कुछ भूलने लगी हैं लेकिन आज भी हमारी फिक्र उन्हें सताती हैं,
कहते है माँ एक पूरा संसार होती है ये बात अब सच लगने लगी हैं,
मेरी मम्मी अब मेरी माँ बन गई हैं।।
विद्या बाहेती महेश्वरी राजस्थान













