
जन्मदात्री की ममता से जीवन महक उठता है,
उसके आँचल में हर दुख चुपचाप सिमटता है।
त्याग, तपस्या, प्रेम की वह अनुपम गाथा है,
माँ ही धरती पर ईश्वर का सच्चा रूप कहाता है।
ममता की मूरत होती माँ, सुख की शीतल छाया,
आँचल में संसार समेटे, प्रेम सुधा बरसाया।
पीड़ा सहकर जन्म दिया, जीवन-ज्योति जलाई,
त्याग तप से हरदम ही, खुशियों की फुलवारी सजाई।
भूखी रहकर पेट भरे वह, बच्चों को हँसाती,
अपने आँसू पीकर भी, सबके दुख हर जाती।
संस्कारों की दीपशिखा बन, राह सदा दिखलाए,
संकट चाहे जितने आएँ, माँ हिम्मत बन जाए।
माँ की ममता गंगा जैसी, निर्मल पावन धारा,
जिसके आँचल तले महकता, जीवन का उजियारा।
उसकी वाणी मधुर सरगम, मन वीणा झंकृत करती,
सूनी राहों में भी माँ, आशा के दीपक धरती।
माँ के चरणों में बसता है, जग का हर सम्मान,
उसकी सेवा से बढ़कर नहीं, कोई तीर्थ महान।
ईश्वर का अनुपम उपहार, जग में माँ कहलाती,
जन्मदात्री के श्रीचरणों में, श्रद्धा शीश झुकाती।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













