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माँ — एक अंतहीन दुआ

“कुछ रिश्ते लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते, और माँ… माँ तो वो इबादत है जो खुदा से पहले कुबूल होती है।”

कहाँ ख़त्म होती है माँ? वो तो रमता जोगी है,
वाणी में अमृत, रूह में फकीरी, वो ममता की रोगी है।।

जो कभी थक कर नहीं रुकी, वो रब्बी दुआ है माँ,
धूप, उमस और शीतल छांव की एक मुकम्मल दास्ताँ है माँ।।

लिखने बैठूँ उसकी अज़मत, तो कायनात सिमट जाती है,
समंदर की स्याही और पन्नों की उम्र कम पड़ जाती है।।

वो नदी के कगारी सा सब्र, वो दरिया सा बहता पानी,
हर पतवार पे उसका पहरा, हर लहर उसकी दीवानी।।

आज माटी में मिल गई है काया, जल रही है वो अग्नि,
पर राख होकर भी तड़प रही है—अपने लाल की चिन्ता में।।

अंगारों के बीच लेटी है, पर रूह अब भी साया करती है,
खुद जलकर भी वो अपने बच्चे पर ठंडी छाया करती है।।

वो विदा होकर भी कहीं गई नहीं, वो तो सांसों में रवां है,
ज़मीन पे भले न दिखे, पर मेरे सर का आसमां है।।

दुनियां की इस भीड़ में, जब भी मैं तन्हा होती हूँ,
उसकी ममता की लोरी, खामोशी में भी सुनती हूँ।।

मिलेगी मंज़िल मुझे भी, ये यक़ीन है मेरा,
क्योंकि ‘रजनी’ की हर राह में, माँ की दुआ का सवेरा है।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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