
मां जन्मदात्री है, एक अक्षरीय रिश्ता अनुपम , अनुपमेय बरगद के वृक्ष सम जीवन के ताप में शीतलता प्रदान करता है।
बादशाह अकबर ने रोते हुए सभा में कहा था कि ” अकबरा “
कहकर मुझे अब कौन पुकारेगा?
मां का ही रिश्ता ममतामयी होता है।
ओ मां तू जहां भी हो, तुझे मुझ कृतज्ञ का सादर नमन प्रणाम है।
जो केवल अपना भला चाहे वह दुर्योधन है , जो ” अपनों” का भला चाहे वह युधिष्ठिर है और जो ” सबका ” भला चाहे वह श्रीकृष्ण है।
केवल अपना भला चाहने वाला पापात्मा है , अपनों का भला चाहने वाला पुण्यात्मा है और
सबका भला चाहने वाला परमात्मा है।
दुर्योधन पापात्मा है,युधिष्ठिर पुण्यात्मा है और श्रीकृष्ण परमात्मा।
शीलू जौहरी
भरूच












