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माँ — ईश्वर की अद्भुततम रचना


माँ की रचना अकल्पनीय, ईश्वर से भी न्यारी है,
सृष्टि की सबसे सुंदर मूरत, जग में सबसे प्यारी है।
प्रकृति की हर छवि फीकी है, माँ के अनुपम प्यार तले,
उसके आँचल की छाया में, जीवन के सब दीप जले।
माँ केवल जननी नहीं, वह जग की पालनहारी है,
उसकी ममता के आगे हर शक्ति भी हारी है।
वह भूखी रहकर भी अपने बच्चों को तृप्त कराती है,
अपने आँसू पीकर भी होंठों पर हँसी सजाती है।
उसकी गोद में स्वर्ग बसता, चरणों में संसार है,
माँ के बिना हर सुख अधूरा, माँ से ही परिवार है।
उसकी दुआएँ ढाल बनें, हर संकट से लड़ जाती हैं,
माँ की ममता की गहराई, सागर से बढ़ जाती है।
ईश्वर ने जब प्रेम रचा होगा, माँ का स्वरूप बनाया होगा,
धरती पर खुद जन्म लिया, ताकि माँ का प्यार पाया होगा।
राम बने कौशल्या के लाल, यशोदा के कृष्ण कन्हाई,
माँ के आँचल से बढ़कर जग में कोई छाँव न पाई।
माँ का ऋण चुकाना असंभव, ये जीवन भी कम पड़ जाए,
उसके चरणों की धूल मात्र से, सौ जन्मों का फल मिल जाए।
माँ त्याग, तपस्या, करुणा है, माँ जीवन का आधार है,
माँ से बढ़कर इस धरती पर, ना कोई अवतार है।
माँ ही मंदिर, माँ ही पूजा, माँ ही वेद पुराण है,
माँ के चरणों में ही बसता, मेरा सारा जहान है।
जिसने माँ का मान किया, उसने ईश्वर को जान लिया,
माँ की सेवा में जिसने जीवन जिया, उसने सच्चा सम्मान किया।
माँ…
तू केवल शब्द नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि की वंदना है,
तू ईश्वर की सबसे सुंदर, सबसे पावन कल्पना है

आर एस लॉस्टम

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