
जैसा हूँ वैसा दिखता हूँ।
महँगा हूँ सस्ता बिकता हूँ।
मुझसे यूँ हैरान हैं सारे,
मैं बातें सच्ची कहता हूँ।
फुल्का हूँ मैं छींटों वाला,
तपते उपलों पर सिकता हूँ।
हूँ मिट्टी के मटके जैसा,
तर उतना जितना रिसता हूँ।
गीत, ग़ज़ल,कविताओं में सब,
जीवन के मसले लिखता हूँ।
हाथों में है महक उसी की,
मैं इनसे चंदन घिसता हूँ।
नवीन माथुर पंचोली












