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मां तेरे रूप हजार

हजार दुःख सह कर मां ने हमे
दिव्य जीवन का सुख दिया ।
सीता और मीरा बन कर उस मां ने
कभी अग्नि परीक्षा दी कभी जहर पिया ॥

आसान नहीं है मां के त्याग को
शाब्दिक अर्थों में लिख – बोलना ।
घृष्टता है मां के पावन रिश्ते को
किसी सेवा कर्म से कम तोलना ॥

मां के दूध का कर्ज हो या
देश भक्ति के फर्ज का सवाल ।
वफादारी है जिसकी रगों में
ऊंचा है उसका नैतिक भाल ।

मां को दूत बना ईश्वर ने भेजा
हर जीव में रचे बसे मां हमारे ।
आदमी – आदमी रहे जानवर नहीं बने
जानवर बशर्त आदमी बन जाये सारे ॥

राकेश आनन्दकर
अजमेर राजस्थान

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