
तुम्हें देख कर अंकुरित प्रणय
मानों धरती पर सावन की फुहार
जब पहली बार नजरों से नजरें मिली मिलती है तो मन के उपवन में प्रेम
स्वयं अंकुरित उठता है
तुम्हारे आने से, मेरी खामोश दुनियां में जैसे बहारआ गई हो
यही प्रेम है, एक सुखद हंसी एहसास है
जैसे बंजर जमीन पर बारिश की बूंदे बरसी हो
की उजड़ी बगिया मन की मेरी
तुम आए तो यूं लगा जैसे पतझड़ में
बसंत आ गया हो
तुम्हें देखकर अंकुरित प्रणय
अब बरगद -सा घना होता जा रहा
हर धड़कन में तुम्हारा अक्स नजर आ रहा
मेरी सांसों में रवानगी है, धड़कनों में एक नयी लय है
तुम्हारे ख्यालों में खोई -खोई सी रहती हूं
मेरा दिल बेहाल हो रहा है
तुम्हें देखकर अंकुरित हुआ है प्रेम का बीज, जो अब बढ़ने लगा है
क्या करूं..? तुम्हें देखकर ये दिल
अब खुद में ही खोने लगा है
मेरी आंखें सिर्फ तुम्हारे लिए ही तरसी हैं
मेरे सूखे ,मुरझाए हुए अंतर्मन में
कोई नाजुक सा धागा मानों टूटा हुआ
है
हर सांस में तुम याद आए ये अंकुर जो फूटा है आज
तुम्हारी हंसी की धूप पड़ी तो
मेरे दिल में कोपलें फूट पड़ी
सात जन्मों तक हमारा प्यार
यूं ही बना रहे
डॉ मीना कुमारी परिहार












