
सोमनाथ मन्दिर अमृतमहोत्सव:
ओम् सोमनाथाय नम:
सोलह ज्योतिर्लिंगों में पहला,
यह भगवान् शिव का दरबार।
सोमनाथ के इतिहास में,
ऐसा हुआ है पहली बार।
ग्यारह मई सन् दो हजार छब्बीस को,
सोमनाथ के हुए पछत्तर वर्ष पूर्ण।
ग्यारह तीर्थो से मंगवा पवित्र जल,
किया अभिषेक भरपूर।
अमृतमहोत्सव ऐसा मनाया,
जैसे बरस रहा अमृत भरपूर।
शिखर कलश ऐसा चमक रहा,
जैसा उसमें समा गया सृष्टि का नूर।
आराध्य देव श्री सोमनाथ का,
किया पूजन वंदन अदभुत।
कर पुनर्निर्माण शिखर कलश का,
आस्था हुई और मजबूत।
हिरण कपिला और सरस्वती का,
यह स्थान त्रिवेणी संगम है।
कुंभाभिषेक कर श्री सोमनाथ का,
गंगा हुई हृदयंगम है।
आस्था और विनाश के इतिहास का,
यह प्रसिद्ध स्थल है।
सत्रह बार टूटने पर भी,
यह अडिग अपने थल है।
अल- जुनैद, गजनवी, खिलजी,
औरंगजेब जैसे निकृष्टि।
किया प्रयास तोड़ने का मन्दिर,
भला कहाँ सफलता इनको मिलती।
भला टूटता कैसे यह मन्दिर,
किया हो जिसे देवौं ने निर्मित।
शिखर विराजित स्वर्ण कलश,
जो है दस टन स्वर्ण से निर्मित।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












