
विधा- काव्य
ए बचपन लौटकर आजा
सोये अहसास फिर जगा जा
जिंदगी की तपन मे शौक कहीं मर गये
जिन्दा हूँ लाश एक चलते फिरते बन गये
कोई भावनाएँ अब जहन मे ना रही बाकी किसी को जताने मे
जी रहे है सीने मे पत्थर रखकर उत्साह उमंग सब काफुर् है जमाने मे
बचपन जीवन का एक हंसी लम्हा था
बिना बात ही अहसास समझना भी एक समझना था
काश कि वो बचपन बढ़ती जवानी का एक हिस्सा बन जायें
ज़ज़्बातों मे बह जा रही दुनियाँ प्रेम अपनेपन का जीता जागता अफसाना बन जायें
लौटता नही समय वो जो गुजर गया
क्या कहुँ कि जिंदा थे लाश बन गया
बचपन ना गुजरे किसी का ना आये ये जवानी
दिमाग वाली जवानी से ना बने किसी की कहानी
गर हर उमर मे बचपना इंसान का रहे कायम
दुनियाँ सँवर जायेगी होगा जन्नत का आलम
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












