
राजनीति हमसे दूर संसद की बहसों तक सीमित नहीं है। एक नीतिगत फैसला आपके घर की रसोई, बच्चों की स्कूल-फीस और आपके जेब के मोबाइल डेटा तक नीचे उतर आता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है—2016 का नोटबंदी का निर्णय।
8 नवम्बर 2016, रात 8 बजे। प्रधानमंत्री ने घोषणा की—500 और 1000 के नोट आज रात से कागज़ हैं। देश में 86% नकदी एक झटके में चलन से बाहर हो गयी। मकसद था काला धन बाहर करना, नकली नोट और आतंकी फंडिंग पर चोट करना। निर्णय राजनीतिक था, पर असर हमारे हर घर तक पहुँचा।
तत्काल प्रभाव: अफरा-तफरी से डिजिटल तक- अगली सुबह बैंक और ATM के बाहर लाइनें लग गईं। मज़दूर की दिहाड़ी अटकी, शादी वाले घर में कैश का संकट छाया, छोटे दुकानदार का धंधा ठप हुआ। मेरी पड़ोस की आंटी ने तीन दिन सब्ज़ी उधार ली क्योंकि 2000 का नोट कोई खुल्ला ही नहीं दे रहा था।
लेकिन यहीं से बदलाव भी शुरू हुआ। Paytm, PhonePe, UPI—जो नाम कभी सुने न थे, घर-घर तक पहुँच गए। ठेले वाला भी भैया “स्कैन करो” बोलने लगा। जो लोग बैंक से कभी डरते थे, वो जन-धन खाते में लाइन में लगे। भारत डिजिटल भुगतान में दुनिया का नम्बर एक लीडर बन गया—आज UPI से हर महीने 15 लाख करोड़ से ज़्यादा लेन-देन होता है।
लंबी अवधि का असर: आदत से व्यवस्था तक- पारदर्शिता: नकदी कम हुई तो खर्च का हिसाब रखने की आदत बढ़ने लगी। GST के साथ मिलकर नोटबंदी ने टैक्स बेस बढ़ाया। आज 8 करोड़ से ज़्यादा लोग ITR भरते हैं, 2014 में 3.8 करोड़ थे। छोटे व्यापार का कायापलट: पहले ‘कच्चा बिल’ आम था। अब QR कोड लगा तो ग्राहक भी हिसाब मांगने लगा। कई दुकानदारों ने पहली बार लैपटॉप खरीदा, बही-खाता एक्सेल पर शिफ्ट हुआ। आर्थिक चोट: असंगठित क्षेत्र—कंस्ट्रक्शन, कपड़ा, हीरा—जहाँ 80% नकदी चलती थी, बिखर गया। CMIE के मुताबिक नोटबंदी के बाद 15 लाख नौकरियाँ चली गईं। गाँव से शहर आया मज़दूर वापस अपने गाँव लौटा।
निष्कर्षः सोच में बदलाव: ‘कैश इज़ किंग’ वाली मानसिकता टूटती नजर आई। माँ ने भी सीख लिया—“बेटा, फोन-पे कर दे।” 60 साल के रिटायर्ड अंकल अब नेट-बैंकिंग से ही बिजली बिल भरते हैं। हमें सबक क्या मिला- राजनीति का एक फैसला बताता है कि सरकार और नागरिक कितने जुड़े हैं। नीति नीयत से बनती है, पर ज़मीन पर उसकी शक्ल हालात तय करते हैं। नोटबंदी ने काला धन कितना निकाला, इस पर आज भी बहस जारी है। पर इसने हमें कैशलेस, कॉन्टैक्टलेस इकोनॉमी की तरफ धकेल दिया—कोविड में यही UPI हमारे लिए संजीवनी बना। आज जब बच्चा टॉफी के लिए भी QR स्कैन करता है, तो समझ आता है—राजनीति का वो 8 PM का भाषण अब भी हमारे 8 AM की चाय तक असर कर रहा है।
इसलिए अगली बार कोई नीति बने—चाहे कृषि कानून हो, नई शिक्षा नीति हो या स्वास्थ्य नीति हो—उसे ‘नेताओं का मामला’ कहकर कभी मत टालिए। क्योंकि लोकतंत्र में राजनीति का हर एक निर्णय, आखिरकार आपके घर के ड्राइंग-रूम में आकर बैठता है इसलिए सजग रहे,सही राह चुनें।।
मुन्ना राम मेघवाल ।
कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।












