
कृष्ण का मथुरा जाना
साँझ ढली जब वृंदावन में, रोया कुंज-कछार,
मथुरा जाने लगे कन्हैया, सूना हुआ द्वार।
मुरली की वह मधुर तान अब, कानों में न आती,
यमुना भी चुपचाप खड़ी थी, लहर न मुस्काती।
राधा की आँखों के भीतर, सावन उतर आया,
प्रिय के बिन हर फूल वनस्थली, जैसे मुरझाया।
ग्वाल-बाल सब राह निहारें, धूल उड़ाती डगर,
नंद भवन में मौन पसरा था, व्याकुल था हर घर।
कान्हा बोले — “धर्म पुकारे, जाना अब आवश्यक,”
पर मन उनका भी भीगा था, प्रेम रहा अव्यक्त।
रथ आगे बढ़ता जाता था, पीछे छूटा धाम,
राधा ने बस अश्रु भेजे, लेकर श्याम का नाम।
विरह बना फिर प्रेम अमर का, अनुपम एक प्रमाण,
राधा-कृष्ण मिलन से ऊँचा, उनका यह बलिदान।
बरसों बीते फिर भी राधा, बाट निहारें आज,
प्रेम अमर है जहाँ विरह हो, यही प्रेम का राज।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार












