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मन की उलझन से तेरी ग़ज़ल तक

आज मन ने कहा कुछ लिखूं,
पर ठहरा कलम, कि क्या लिखूं।
शब्द खड़े थे खामोश से,
सोचूं किस पर, और क्यों लिखूं।

दर्द लिखूं या सपनों को,
बीते लम्हों के अपनों को।
हँसी लिखूं या अश्कों की धारा,
या दिल के सूने कोनों को।

जीवन के इस अनजाने पथ पर,
हर पल नया एक प्रश्न मिला।
मन बोला सच को कागज़ दे दूं,
जो भीतर अब तक मौन खिला।

फिर समझा—लिखना खुद को पाना,
भावों को स्वर में ढलने देना।
जो दिल कहे, वही सत्य बने,
बस अपने मन को बहने देना।

फिर मैंने विचार किया,
क्यों न तुझ पर ही लिखूं।
तेरे बालों की घटाओं पर,
तेरे गालों की लाली पर लिखूं।

तेरे होठों की मुस्कान पर,
या तेरी आँखों की कहानी पर लिखूं।
तेरी बातों की मिठास पर,
या तेरी खामोश रवानी पर लिखूं।

तेरे जज़्बातों की गहराई में,
शब्द अक्सर खो जाते हैं।
तेरी रूह की सादगी को,
अल्फ़ाज़ कहाँ छू पाते हैं।

क्या लिखूं उस दिलकशी पर,
जो हर एहसास में बसती है।
तू खुद एक मुकम्मल ग़ज़ल है,
जिसे सोचकर ही कलम सजती है।

अब यही सोचकर ठहर जाता हूँ
तुझ पर क्या लिखूं, कैसे लिखूं…
जब तू स्वयं ही कविता है,
तो तेरे जज़्बात क्या लिखूं।

आर एस लॉस्टम

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