
गुणगान स्वयं का करते जो
वो भूल गए वसुधा गुणवानों से भरी हुई है,
मूल्य जो अपना लगा रहे है
कह दो स्वयं का मूल्यांकन होता ही नहीं है।
कांटों के पथ पर चल कर देखो
राम का चिंतन आ जायेगा,
शबरी के बेरो को खाकर
बैरी भी राम के गुण गायेगा।
पीकर हलाहल जब शंभू ने
सृष्टि को तारा था,
विष भंजन बनकर शिव जी ने
क्षीर सागर को संवारा था।
लोभी कपटी कामी क्रोधी
अगुवाई जो करते है,
राम के नाम को उच्चारित कर
सत्ता का फल चखते है।
अंश मात्र भी जिनको
सत्ता का कोई मोह नहीं रहा,
नाम उन्हीं का ले लेकर
सत्ता पर काबिज है सब यहां।
कवि संगम त्रिपाठी
जबलपुर मध्यप्रदेश












