
मीरा के प्रेम के वश में होकर,
प्रभु ने जाने क्या क्या कर डाला।
सर्प भिजया जो मीरा की खातिर,
फूलों का हार उसे कर डाला।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर,
नाग की सुंदर बना डाली माला।
विष भेजा जो मीरा को पिलाने,
विषधर ने विष को अमरित कर डाला।
जाने क्या क्या कष्ट सहे मीरा ने,
कष्टों में प्रभु ने है मीरा को पाला।
प्रेम विश्वास और समर्पण से,
मीरा ने हरि को ही हर डाला।
जग का रचियता प्रेम के वश हो,
जग को प्रेम में ही रंग डाला।
अंत समय जब मीरा का आया,
प्रभु ने मीरा को खुद में समाया।
इससे बड़ा भला प्रेम क्या होगा,
जो मीरा ने प्रभु से है निभाया।
मीरा के प्रेम के वश में होकर,
प्रभु ने जाने क्या क्या कर डाला।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)













