
जिस मिट्टी में जन्म लिया, उसी को बेच डाला,
चंद सिक्कों की खातिर ईमान को फेंक डाला।
वतन के नाम पर कसमे खाई थी जिसने,
उसी ने वतन का हर सपना बेच डाला।
सरहद पर जवान लहू बहाता रहा,
ये कुर्सी पर बैठा हिसाब लगाता रहा।
शहीदों की चिताओं की आग ठंडी ना हुई थी,
ये सौदागर वतन का ख्वाब लगाता रहा।
नदियों का पानी, जंगल की हरियाली,
मजदूर का पसीना, किसान की रखवाली।
बोली लगा दी हर उस चीज़ की यहाँ,
जिस पर लिखा था “भारत माँ की लाली”।
भूख से बिलखते बच्चे इन्हें दिखते नहीं,
फटे हुए तिरंगे का गम इन्हें दिखता नहीं।
बस तिजोरी भर जाए, खजाना भर जाए,
इनको वतन का ज़ख्म दिखता नहीं।
तारीख़ गवाह है, तारीख़ गवाह रहेगी,
गद्दारों की नस्लें भी शर्मिंदा रहेंगी।
जिसने बेचा है माँ का आँचल बाजार में,
उसकी कब्र पर भी मिट्टी शर्मिंदा रहेगी।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













