Uncategorized
Trending

दर्द की दास्ताँ

दर्द इतना दिया तुमने कि,
कभी भूल न पाऊँ मैं,
इन गलियों में राह तकता रहूँ,
पर टूटे सपनों को जोड़ न पाऊँ मैं।

ज़िंदगी है, इसलिए ज़िंदा हूँ,
सिर्फ जीने के लिए,
वरना कब का मिट गया होता,
इस दुनिया में नाम पाने के लिए।

मैं और मेरी साँसें अब भी,
यूँ ही चलती रहती हैं,
शायद किसी अधूरी चाह में,
या तेरी यादों के सहारे रहती हैं।

काश ये दुनिया न होती,
न मैं होता, न ये दर्द होता,
इन अनजाने घावों को सहने का,
फिर कोई मजबूर सफ़र न होता।

अब किससे कहूँ अपने दिल की बात,
जब मैं खुद से ही दूर हो गया हूँ,
अपने ही दर्द को समझाने में,
जाने कब से मजबूर हो गया हूँ।

तुम और मैं कभी थे,
एक ही डाली के दो फूल,
तू चहकती तो मेरी साँसें ठहर जातीं,
तेरी हँसी से महक उठता था सारा उसूल।

तू हँसती तो बगिया खिल उठती,
तू रोती तो दुनिया थम जाती,
तेरी हर धड़कन से मेरी धड़कन,
अनजाने ही जुड़ सी जाती।

शायद इस दुनिया को मंज़ूर न था,
हमारा साथ यूँ उम्र भर का,
तुम मुझे छोड़कर चली गईं,
और रुक गया समय मेरे सफ़र का।

आज भी दिल में एक सवाल है,
कैसे कहूँ तुझसे अपने जज़्बात,
तू दूर होकर भी पास लगती है,
और अधूरी रह गई दिल की हर बात।

— रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *