
घट खाली है, पनघट खाली,
खाली हर एक गगरिया है,
सोच-सोच कर रूह काँपती,
कैसी देखो डगरिया है।
तड़प रही है माटी आज,
बूंदों की भीख वो माँगती है,
जब आज ही आँखें सूखी हैं,
तो कल क्यों प्यासा दिखता है?
जल ही जीवन है,
फिर भविष्य क्यों प्यासा है?
आने वाले कल की माँ,
कैसे लोरी गाएगी?
दूध तो होगा छाती में,
पर पानी कहाँ से लाएगी?
सूख चुके हैं होंठ कंठ के,
नैनों में अब नीर नहीं,
ज़रा सोचो उस मंज़र को,
जिससे बदतर कोई तस्वीर नहीं।
हमने ही खोदा गर्त स्वयं,
अपनी ही प्यास बुझाने को,
और तरसता छोड़ दिया,
कल के उस मासूम ज़माने को।
जल ही जीवन है,
फिर भविष्य क्यों प्यासा है?
जहाँ गूँजती थी कलकल,
वहाँ आज देखो सन्नाटा है,
इंसान की इस बेरहमी ने,
कुदरत का आँचल काटा है।
नदियाँ जो कभी बहती थीं,
अब सूखी राख की ढेरी हैं,
ऐ मानव! तेरी आँखों पर,
ये कैसी धुंध अँधेरी है?
तूने नोटों की फसल उगाई,
पर वो प्यास बुझा न पाएँगे,
जब बूँद-बूँद को तरसेगा,
तब ये महल भी रो जाएँगे।
जल ही जीवन है,
फिर भविष्य क्यों प्यासा है?
ठहरो! ज़रा रुक जाओ,
इस बहते पानी को रोक लो,
ये पानी नहीं, भविष्य का लहू है,
इसे ज़मीन में सहेज लो।
हर टपकती बूँद को रोको,
धरा का कर्ज चुकाना है,
जो आने वाला कल है हमारा,
उसे रेगिस्तान नहीं बनाना है।
अगर आज भी तुम न जागे,
तो कल बस लाशें बोलेंगी,
और पानी की हर एक बूँद,
इंसानों का कफ़न तौलेगी।
जागो रे… अब तो जागो…
माटी की सिसकी पहचानो।
कल का बचपन प्यासा न मरे,
इस बूँद की कीमत जानो।
जल ही जीवन है,
फिर भविष्य क्यों प्यासा है?
रीना पटले शिक्षिका
शासकीय हाई स्कूल ऐरमा कुरई
जिला सिवनी मध्यप्रदेश













