
माटी के घट पर बैठी चिड़िया, प्यास लिए कुछ आई है,
तपते मौसम की चौखट पर, जीवन-धुन दोहराई है।
पीले पत्ते बिखरे भू पर, जैसे बीते दिन की याद,
हर पतझर के बीच छिपी है, नव कोंपल की अमर मुराद।
जल की थोड़ी-सी गहराई, उसके लिए समंदर है,
दाना-तिनका जोड़ बनाती, उसका यही मुकद्दर है।
नभ के सारे मुक्त किनारे, फिर भी लौट यहीं आती,
जहाँ दया के छोटे क्षण में, प्रेम-सरिता बह जाती।
मौन घड़ा कुछ कह न सके पर, अर्थ बहुत समझाता है,
प्यास किसी की जब हर ले तो, मानव होना आता है।
आओ ऐसे घट भर जाएँ, हर आँगन हर द्वार तले,
पंछी, पशु, मानव सब गाएँ, नेह बहे इस धरती तले।
छोटा-सा यह दृश्य मगर है, जीवन का विस्तार बड़ा,
करुणा के जल से भर जाए, बस इतना संसार बड़ा।
छाया शाह ‘सख्य’ मुंबई













