
इस जग सभी करें खुशी की तलाश
ये समायी किसी के लिए
भौतिक जगत में
तो कोई करे अंत:करण में
जहां अनुभूति हो …. है परमसत्ता का वास।
जिंदगी भर लगा रहे नर फिर भी क्यूं हताश
खुशी के क्षण सदा क्षणभंगुर– फिर से शुरु हो तलाश ।
ये दौड़ जीवन भर चले
जब तक तन में चले श्वास।
कोई ढूंढे धन दौलत में… कोई चाहे ज्ञान के प्रकाश।
कोई ढूंढे वंशवल्लरी में
कोई राग-रंग या विस्तृत प्रकृति के पास ।
ढूंढ-ढूंढ वो थक जाए फिर से वो उदास।
खुशी इस मृत्युलोक में
मानव की अनन्त इच्छाओं के बंधन बंधी
इच्छाएं नित्य रंग-रूप दिखाएं
नहीं स्थायी रूप है उनका
नहीं पता वो कब बिखर जाएं
इन इच्छाओं के वशीभूत हो… पूर्णतः न मिले
कहां लुप्त-सी हुई … नहीं मिली… मिली तो मिली फिर से अनन्त तलाश।
पुनः-पुनः सरकता जाए … मृत्यु के पाश ।
संतोष नहीं इच्छा आधीन …
जब मिल जाए … आनंद की चिर स्थिति …
न ही रहे तब खुशी की तलाश
संतोष पाना ही जीवन लक्ष्य
मिल जाए… उस जन के जीवन में तम हटे
पा ले ( चहुं दिस ज्यूं ….)
धरा पर चन्द्र का शुक्लपक्ष … देखे वो तब सत्य का अक्ष।
महेश शर्मा, करनाल













