
पर्यावरण अब सिर्फ ‘पेड़ लगाओ’ का नारा नहीं रहा। क्लाइमेट चेंज, ग्लेशियर पिघलना, बेमौसम बारिश और 50 डिग्री की गर्मी ने बता दिया है कि धरती बीमार है। 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन से लेकर 2023 के दुबई COP-28 तक, पर्यावरण बचाने की रणनीति लगातार बदल रही है। सवाल यह है कि नई रणनीतियाँ कितनी कारगर हैं, चुनौतियाँ क्या हैं और इसका असर आम आदमी पर कैसे पड़ रहा है?
पर्यावरण संरक्षण की बदलती रणनीति: पेड़ से पॉलिसी तक महत्वपूर्ण है। 1970 -1999: संरक्षण का दौर वनो को बचाने के लिए आवश्यक था। शुरुआत में फोकस ‘जंगल बचाओ’ पर था। चिपको आंदोलन, साइलेंट वैली, प्रोजेक्ट टाइगर जैसी पहल हुईं। रणनीति थी—सरकार कानून बनाए, अभयारण्य घोषित करे, लोगों को जंगल से दूर रखे। ‘पर्यावरण बनाम विकास’ की बहस चली। 2000 – 2026: सतत विकास का कॉन्सेप्ट लागु किया गया। रियो समिट 1992 के बाद समझ आया कि गरीबी हटाए बिना पर्यावरण नहीं बचेगा। ‘सतत विकास’ यानी Sustainable Development नया मंत्र बना। CDM, कार्बन क्रेडिट, सोलर मिशन आए। भारत में 2008 में नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज बना। रणनीति बदली—सिर्फ रोकना नहीं, विकल्प देना। 2015-आज: नेट जीरो औरजन-भागीदारी बहुत आवश्यक है।
पेरिस समझौते ने खेल बदल दिया। अब हर देश को ‘नेट जीरो’ का लक्ष्य देना है—भारत ने 2070 तय किया। रणनीति अब ‘टॉप-डाउन’ नहीं, ‘बॉटम-अप’ है। ऊर्जा संक्रमण में सुधार करना चाहिए।कोयले से हटकर सोलर, विंड, ग्रीन हाइड्रोजन पर जोर। भारत का लक्ष्य 2030 तक 500 GW रिन्यूएबल एनर्जी है। पवन, गुजरात में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क बना। मिशन को मिलकर सफल करना जरूरी है। 2022 में PM ने ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट’ लॉन्च किया। संदेश है—सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती। AC 24 पर चलाओ, खाना बर्बाद मत करो, साइकिल चलाओ। यानी पर्यावरण अब ‘सरकारी काम’ नहीं, हमारा ‘संस्कार’ है। टेक्नोलॉजी + स्थानीय ज्ञान का समुचित उपयोग करके हमें आगे बढना चाहिए। ड्रोन से जंगल की निगरानी, AI से मौसम की भविष्यवाणी। साथ ही, आदिवासियों के ‘पवित्र उपवन’, राजस्थान का ‘जोहड़’ सिस्टम जैसे परंपरागत तरीके फिर अपनाए जा रहे हैं।क्लाइमेट जस्टिस की बात करना बहुत महत्वपूर्ण हैं। COP-28 में भारत ने साफ कहा—”जिसने सबसे ज्यादा कार्बन छोड़ा, वही पैसा दे”। विकसित देश 100 बिलियन डॉलर का वादा पूरा करें। रणनीति अब ‘ब्लेम गेम’ नहीं, ‘फेयर गेम’ की है। हमारे सामने खड़ी अनेक चुनौतियाँ दिखाई देती है। विकास बनाम पर्यावरण का द्वंद्व बढता ही जा रहा है। हाईवे चाहिए, तो जंगल कटेगा। फैक्ट्री लगेगी, तो नदी प्रदूषित होगी। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, हसदेव जंगल की कटाई इसके उदाहरण हैं। 8% GDP ग्रोथ चाहिए, पर कार्बन भी घटाना है—यह सबसे बड़ी नीतिगत चुनौती है। धन और तकनीक की कमी को दुर करना बहुत आवश्यक है। नेट जीरो 2070 के लिए भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर चाहिए। सोलर पैनल, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन की तकनीक अभी महंगी है। विकसित देश फंड नहीं दे रहे। गरीब देश करे तो क्या करे? आज भी जन-जागरूकता का अभाव नज़र आता है। शहर में लोग ‘क्लाइमेट चेंज’ पर बात करते हैं, पर गांव में किसान को लगता है ‘यह अमीरों का चोंचला है’। प्लास्टिक बैन के बाद भी पॉलीथिन मिल रही है, क्योंकि विकल्प महंगा है। LiFE मिशन तब सफल होगा जब 140 करोड़ लोग अपनाएंगे।हमको नीति और नीयत में अंतर करना बहुत जरूरी है। कागज पर कानून सख्त हैं—वन संरक्षण अधिनियम, वायु प्रदूषण अधिनियम। पर जमीन पर अवैध खनन, फैक्ट्रियों से जहरीला पानी, पराली जलना जारी है। प्रदूषण बोर्ड भ्रष्टाचार का शिकार है। जलवायु विस्थापन की समस्या बढ़ती जा रही हैं। सुंदरबन डूब रहा है, जोशीमठ धंस रहा है, चेन्नई में बाढ़ आ रही है। 2050 तक भारत में 4.5 करोड़ ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ हो सकते हैं। उनके लिए घर, नौकरी कहां से लाएंगे?
इसका प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था से थाली तक होना निश्चित है। आर्थिक प्रभाव स्पष्ट रूप से नज़र आ रहा है। एक तरफ ग्रीन जॉब्स बढ़ रहे हैं—सोलर इंस्टॉलर, EV मैकेनिक, कार्बन ऑडिटर नए करियर हैं। 2023 में रिन्यूएबल सेक्टर ने 10 लाख नौकरियां दीं। दूसरी तरफ, कोयला खदानें बंद होने से झारखंड-छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी का डर है। ‘जस्ट ट्रांजिशन’ जरूरी है।
कृषि पर असर बहुत नुकसान करने वाला होता है। बेमौसम बारिश से गेहूं-सरसों खराब, गर्मी से पैदावार कम। इससे महंगाई बढ़ती है। पराली न जलाने का दबाव है, पर किसान को हैप्पी सीडर मशीन महंगी पड़ती है। जलवायु-स्मार्ट खेती अपनानी होगी—ड्रिप इरिगेशन, मिलेट्स की वापसी। स्वास्थ्य पर संकट बढता दिखाई दे रहा है। दिल्ली का AQI 500 पार जाता है तो फेफड़े खराब होते हैं। गर्मी से हीट-स्ट्रोक बढ़ रहे हैं। डेंगू-मलेरिया का दायरा पहाड़ों तक पहुंच गया है। WHO कहता है, वायु प्रदूषण से भारत में हर साल 16 लाख मौतें होती हैं। सामाजिक दुष्प्रभाव बेहद चिंताजनक है। पानी के लिए लड़ाई शुरू हो गई है। बेंगलुरु, चेन्नई में टैंकर माफिया हावी है। भविष्य में ‘वॉटर वॉर’ हो सकती है। आदिवासी जंगल से बेदखल हो रहे हैं, क्योंकि ‘टाइगर रिजर्व’ बढ़ रहे हैं। पर्यावरण न्याय और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलना होगा।
निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण अब ‘छुट्टी के दिन पौधरोपण’ से आगे निकल चुका है। यह विदेश नीति, अर्थनीति और राजनीति का केंद्र बन गया है। रणनीति बदली है—डंडे से नहीं, डेटा और धर्म से समझाना है। चुनौतियाँ पहाड़ जैसी हैं, पर भारत ने इंटरनेशनल सोलर अलायंस, चीता रीइंट्रोडक्शन जैसे कदमों से दिखाया है कि नीयत साफ है।परंतु असली बदलाव तब आएगा जब ‘नेट जीरो’ सरकारी फाइल से निकलकर हमारे किचन, बाथरूम और ड्राइंग रूम में पहुंचेगा। गांधी जी ने कहा था—”धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, पर लालच नहीं”। 21वीं सदी में लालच छोड़ना ही सबसे बड़ी रणनीति है। क्योंकि अगर पर्यावरण नहीं बचा, तो अर्थव्यवस्था, विकास, GDP—कुछ भी नहीं बचेगा। क्लाइमेट चेंज ‘भविष्य’ की समस्या नहीं, ‘आज’ का संकट है। आओ हमसब साथ निभाए, पर्यावरण को मिलकर बचाए।।
मुन्ना राम मेघवाल। कोलिया,डीडवाना,राजस्थान।













