
ज़िन्दगी में बस यही एक काम ना हुआ,
जी हुजूर, जी हुजूर और सलाम ना हुआ।
बेच के जमीर सब बन गए बड़े बड़े,
मुझसे पर अदा ये शोहरत का दाम ना हुआ।
प्यार से बुलाया जिसने, उसी के हो गए,
डर से मैं किसी का लेकिन गुलाम ना हुआ।
एक कमी थी मुझसे, सच बोलता था मैं फ़क्त,
एक यही वजह थी दुनियां में नाम ना हुआ।
शायरी, शराब, क्या क्या ना आजमाया पर,
मेरे दर्द में जरा भर आराम ना हुआ।
सिर झुकाकर मैंने मंज़िल से सवाल ना किया,
अपनी शर्तों पर जिया, कोई इल्ज़ाम ना हुआ।
भीड़ में शामिल हुए लोग मुखौटे पहनकर,
मुझसे पर चेहरा बदलना सुबह-ओ-शाम ना हुआ।
ताज पहनने को कहा दुनिया ने झुककर,
मैंने कहा तख़्त से बेहतर है मेरा नाम ना हुआ।
रोटियाँ तो मिल गईं थोड़ी सी मेहनत से मगर,
पेट भरने के लिए कोई हराम ना हुआ।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













