
अपने पापा के लिए रुक के दुआ करता हूँ,
देखता हूँ मैं जहाँ कोई खिलौने वाला।
सोचता हूँ बचपन में जो मांग ना सका उनसे,
काश आज उनके हाथों से वो मिल जाए दोबारा।
उनकी झुकी हुई कमर को देखकर,
अपना कद भी छोटा लगने लगता है।
जिन कंधों पे खेला करता था कभी,
आज उन कंधों का बोझ उठाने को जी करता है।
थकान से चूर उनका चेहरा देखूं जब,
अपनी सारी ख्वाहिशें भूल जाता हूँ।
खुद भूखा रहकर हमें खिलाने वाले,
उन हाथों में जन्नत ढूंढता रहता हूँ।
जेब में पाई-पाई जोड़कर जो लाए थे,
मेरी फीस भरने की खातिर।
आज उसी जेब में हाथ डालूं तो,
हाथ कांपते हैं शर्मिंदगी से आखिर।
बचपन में साइकिल पर आगे बिठाते थे,
गिरने ना देते थे कभी।
आज दुनिया की ठोकरों से बचाने को,
काश वो साइकिल फिर चल पड़े अभी।
सख्त लहजे में डांटते थे जब वो,
तब समझ ना पाया था मैं।
आज उनकी खामोशी चुभती है इतनी,
कि हर डांट में छुपा प्यार याद आता है
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













