
जिंदगी हसीं थी
तुम नाज़नीं थी
एक हसीं तुम्हारी जानलेवा थी
शहर की दिलकश सुकुनी एक हवा थी
लहराती ज़ुल्फ़ों के सायें तले तेरा वो पलटना
मुस्कुराते सुर्ख होंठों से दीदार मेरा करना
इश्क का खूबसूरत वो एक दिलकश समाँ था
प्यार करने का वो नाज़नीं पल कुछ अपना सा था
उन पलों के सहारे जिंदगी कुछ आसाँ सी लगती हैं
यादों के सहारे बची हुई जिंदगी कटती है
लौटकर अब ना तुम आओगे ना वो समय आएगा
जीवन का पड़ाव आख़िर है गली से तेरी मेरा जनाज़ा जायेगा
जीवन था इश्क को गले लगाया था
लाखों फूंकते है हमने भी ए यार तुझे आजमाया था
गम ए नसीहत थी ईश्क ज़माने का नफरमान एक फंसाना है
दूर तलक बस तन्हाई है डूबकर मर जाना है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













