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आदित्य तुम नीरस लगते हो

हर कविता रचना के साथ
कवि को तस्वीर बदलना है,
हर खासो आम अवसर पर
अपना परिधान बदलना है।

लोग कहते हैं कि एक ही
तस्वीर हर जगह लगाते हो,
कविता कितनी ही अच्छी हो,
आदित्य तुम नीरस लगते हो।

तस्वीर बदल कर देखो तो,
तुम कितने अच्छे लगते हो,
अलग अलग दिखो तो अच्छा हो,
लिबास बदल के देखो अच्छा हो।

कुछ लोग हँसी भी करते हैं,
हर बार वस्त्र बदलते रहते हो,
हर अख़बार में तुम क्यों अपनी
तस्वीर बदल बदल कर देते हो।

लेखक कवि सहज सरल होते हैं,
साहित्यकार तो साहित्य रचना में,
अपना ध्यान तक नहीं रख पाते हैं,
हर पल हर दम अस्त व्यस्त होते हैं।

पाठक और समालोचक अपना
दृष्टिकोण जब इस पर रखते हैं,
आदित्य वे भावभिव्यक्ति करते हैं,
पर क्या कवि की भाँति सोचते हैं।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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