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अपनों को भूल गया

दर दर ठोकर खाता प्राणी, सच्चे मार्ग को भूल गया,
जीवन ही एक यज्ञ है प्यारे, करना हवन को भूल गया।

कितनी बातें कितनी घातें, बाहर की तूने खायी है,
परिवार ही सुन्दर बगिया है, इसी चमन को भूल गया

सुख दुःख तो आती जाती है, प्रेम वचन ही स्थिर है,
अंधियारे में एक किरण है, इसी भजन को भूल गया।

मन्दिर मन्दिर भटका प्राणी, घर एक मन्दिर नहीं जाना,
गृहस्थ एक तपोवन है, इसे ही पूजना भूल गया

जहां प्रेम कुशलक्षेम प्रीति है, बिन कटुता का भाव कहां,
एक कड़वाहट में ही सारे,खून के रिश्ते भूल गया।

प्रेम का एहसास है रिश्ते,बन्धन का विश्वास है रिश्ते,
गैर ही अच्छे लगने लगे अब, दिल का बन्धन भूल गया।

बिछड़ना मिलना रूठना मनाना, जीवन का है सार यही,
सब कुछ याद रहा है मन को, पर अपनो को भूल गया।

रवि भूषण वर्मा

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