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दोहरी सोच का समाज

कैसी समाज की सोच बनी,
कैसी है आज भी आशाएं।
कपड़ों से इन्सां तौलने की,
कैसी रची हैं परिभाषाये।।

कोई लड़की सूट पहनती यदि,
तो “गांव- ग्वार” वो कहलाये,
उसकी शिक्षा,और संस्कार पे,
क्यों लोग आज उंगली उठाये।।

वही जींस अधखुला बदन है,
तो सबके मन अति भाती है।
गुड पर्सनैलिटी, “मॉडर्न” कहते,
वह पढ़ी-लिखी कहलाती है।।

यदि सूट में लड़की, बेचारी,
क्यों पहचान दबाई जाती है।
गर टॉप शर्ट, जींस स्कर्ट में,
तो वाह-वाही गाई जाती है।।

तुम सूरत, बाह्य आवरण से,
व्यक्तित्व कैसे परख सकते।
केवल कपड़ो, भोलेपन को,
किस मानक इसे निरख सकते।।

है कहां पढ़ा तुमने आखिर,
कपड़ों से सुंदरता होती?
किस विद्यालय में चरित्र का,
केवल पोशाक मापन होती ?

मेहनत से डिग्रियाँ मिलती,
शील,संस्कार घर से आते ,
कपड़े तो केवल आवरण हैं,
जो बाह्य तन को ढक पाते।।

सुनो पाश्चात्य के तुम दीवानो,
भारतीयता तुम क्यों भूल चले,
अपनी संकीर्ण सोच को रख,
संस्कृति संस्कार भी भूल चले।।

जिस बेटी ने ऊँची शिक्षा पाई,
जिसने स्वयं सपने सँवारे हैं।
तुमने उसका व्यक्तित्व नहीं,
बस कपड़ों के रंग ही निहारे हैं।

मैं पूछूँ उन सब लोगों से,
कब तक पर्दा आँखों पे होगा?
कब शिक्षा अहमियत समझोगे,
कब सोच दायरा बड़ा होगा।।

संकीर्ण सोच क्यों रखते हो?
मानक नहि देह बनावट है।
काया और वस्त्र आवरण नहि,
व्यक्तित्व की सच्ची सजावट है।।

विद्वान सरल सादा रहते,
शिक्षा सदगुण क्यों न परखते हो।
जो वस्त्रों से सम्मान करो,
उनकी सीरत क्यों न निखरते हो।।

फिर सभ्यता, संस्कृति का झूठा,
तुम ज्ञान बांटते फिरते हो।
है असली पहचान तो कर्मों से,
फिर पहनावे पर क्यों मरते हो।

है आज जरूरत बदलने की,
सोच को विस्तृत तुम कर लो।
बिल्कुल कपड़ों से मत आंकों,
इंसा का शिक्षा ज्ञान परख लो।

नेहा कुमारी (खुशी)
शोधार्थी
संस्कृत
जम्मू विश्वविद्यालय जम्मू

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