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आकांक्षा


-गोवर्धन थपलियाल
मैं जीवन भर खुद की पहचान नही कर पाया हूं
दुनियादारी में फंसा रहा खुद को समझ न पाया हूं
अब तो समय निकल गया सोच सोच कर हारा हूं
एकाकी जीवन शेष रहा किंकर्तव्य सा जीता हूं

जन्म लिया जब दुनिया मे अकेला ही आया था
जीवन जी लिया सारा अब चलने की तैयारी है
याद आते हैं वे दिन जब साथ तुम्हारा पाया था
इतनी जल्दी बीत गए वो अब काटे नही कटते हैं

रिश्ते नाते इर्द गिर्द के सब बेमानी लगते हैं
मन को चैन नही मिलता झूठे सारे लगते है
अपनापन नही रहा सबअवसरवादी लगते हैं
दुनिया का दस्तूर समझा स्वार्थ पर टिके हुए हैं

मन अब तो चाहता है कोई न मुझसे बात करे
शांत मन से चितन कर एकाग्रता ईश मे बनी रहे
मोह माया जंजाल मान कलुष भाव मन न धरे
जितना साथ निभाना था निभा दिया ईश सबका भला करे।
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