Uncategorized
Trending

कविता- प्रलयाग्नि

कैसी आग बरसती है ये,
किसने ताण्डव मचा दिया है।
सूरज आग उगलता भारी,
या फिर जला दिया है।

जिसने बैचेनी सी भर दी,
सांसे रोज उखड़ती हैं।
किसी काम में मन न लगता,
तन की नसें अकड़ती हैं।।

ये कैसा विक्षोभ बना है,
ये कैसी प्रलयागिनि है।
या फिर आज सती कोई रुठी,
उठी ज्वाल, जिसकी अग्नि है।

प्रलयकाल की आग धधकती,
दशों दिशायें, भू जलती।
बाहर-भीतर आग तैरती,
बैचेनी पल-पल पलती।।

साँस उखड़ती, चैन नहीं है,
बाहर धधक रही है आग।
नहीं धूप में आँख ठहरती,
मन कहता घर जल्दी भाग।।

सिर में दर्द बना रहता है,
नसें रहें जकड़ी-सी रोज।
मन रहता दुविधा में भारी,
ठण्डक हो पीते ग्लूकोज।।

कूलर से बाहर जाने को,
मन न करें, रहें कब तक?
जैसा तन को बना लीजिए,
वैसा हो जाता ये पक।।

कोई बता दे मुझको आकर,
दशों दिशाओं में कंपन क्यों?
धरा डोलती, गगन है अस्थिर,
जीवन में हलचल सी क्यों?

क्या ये किसी प्रेमिका की है,
विरह अगिनि जो नाच रही।
मन मन्दिर जिसके बस प्रीतम,
जिसके प्रेम की आंच यही।।

जो भी हो अधर्म जब बढ़ता,
प्रकृति मार सहनी पड़ती।
अब फिर क्यों बैचेन है मनुवा,
पीड़ा जो गिरती, उठती।।

भूले सभी सनातन सत् को,
स्वार्थ भरा है रोम-रोम में।
प्रेम बना कामोत्तेजक है,
रहन-सहन, नहिं कोम-कोम में।।

पश्चिम की संस्कृति छायी है,
नहीं रहा सम्मान बड़ों का।
सभी मोबाइल में रहते हैं,
मस्त, खो गयीं बातें करु का?

सभी दूर एक-दूजे से हैं,
होते जाते दूर सदा।
कैसा आया समय मोबाइल,
का, जिसने दी दूरी बना।।

टीवी को नहीं कोई देखता,
अपनों का न देखें चेहरा।
नाच रहीं, बतियाती, गातीं,
रहीं मोबाइल, उनका पहरा।।

अंग-अंग में वही समाये,
ऊपर से प्रकृति की मार।
वृक्ष कटे हरियाली न है,
घुसा मोबाइल में संसार।।

नहीं धरातल पर है कुछ भी,
भरो मोबाइल में तुम रोज।
वृक्ष लगाओ, फोटो डालो,
करो चार धामों का भोज।।

किन्तु धरातल पर न कुछ है,
डिजीटल में सब कुछ रहता है।
वहाँ धूप सम ही रहती है,
डोले भू न गगन अस्थिर।।

होती रोज कथायें चहुँ दिशि,
रामायण, भगवत् के पाठ।
देते हैं व्याख्यान, मगर कुछ,
हुआ नहीं, बाँधो ये गाँठ।।

नहीं हुआ न होने वाला,
जब तक न खुद जागोगे।
यों ही आग बरस जन-मानस,
को दे जला, कहाँ भागेगे??

रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *