
कर्म ही मानव की सच्ची पहचान बनाता है।
गीता का अमृत संदेश यही जग को समझाता है।
फल की चिंता त्याग मनुज, कर्तव्य पथ पर बढ़ता चल।
निष्काम भाव से कर्म कर, जीवन को तू सफल बना।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” का पावन उपदेश महान।
कर्मों से ही निर्मित होता मानव का गौरव-गान।
सुख-दुःख, लाभ-हानि में समभाव सदा अपनाना,
धर्मयुक्त सत्कर्मों से जीवन-पथ को सजाना।
आलस्य और प्रमाद छोड़, पुरुषार्थ का दीप जलाओ।
अंतर में विश्वास जगा, अपने कर्म निभाओ।
जो कर्मों को पूजा माने, वह ऊँचा सम्मान पाए।
अपने सदाचरण से ही जग में यश की ध्वजा फहराए।
कर्म ही पूजा, कर्म तपस्या, कर्म जीवन का सार,
सत्कर्मों से होता मानव इस जग में आदर्श अपार।
अर्जुन को श्रीकृष्ण ने यही सत्य समझाया था।
कर्तव्य निभाने में ही जीवन का सुख पाया था।
श्रेष्ठ कर्म से जग में अपनी अमिट छाप छोड़ो।
मानवता के हित में बढ़कर सद्गुणों से नाता जोड़ो।
धन, वैभव सब क्षणभंगुर हैं, मिट जाते एक दिन,
कर्मों की सुगंध अमर रहती, करती जीवन उज्ज्वल-चिन्ह।
गीता का यह दिव्य संदेश हर मानव अपनाए।
कर्म ही उसकी पहचान है, यही सत्य जग गाए।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













