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गुलाम – ए- जन्नत

मैं उस रानी का ग़ुलाम हूँ
दुनिया जिसे माँ कहती है

ना कोई तख़्त है उसके नाम
ना हीरे जड़े ताज हैं सिर पर
फटी साड़ी में भी लगती है
वो पूरे जहाँ से बेहतर

मैं उस रानी का ग़ुलाम हूँ
दुनिया जिसे माँ कहती है

जब भूख लगी तो रोटी दी
जब प्यास लगी तो पानी दिया
गिरा तो आँचल बिछा दिया
रोया तो दामन में छुपा लिया

थक कर जब मैं घर लौटूँ
दरवाज़े पर खड़ी मिलती है
मेरी ख़ुशी में हँसती है
मेरे ग़म में अकेली रोती है

मैं उस रानी का ग़ुलाम हूँ
दुनिया जिसे माँ कहती है

उसकी दुआओं के दम पर
मैं तूफ़ानों से लड़ जाता हूँ
उसके हाथ का निवाला खाकर
हर ज़ख़्म भूल जाता हूँ

अमन को बादशाहत नहीं चाहिए
बस उसकी ग़ुलामी काफ़ी है
जिसके क़दमों में जन्नत लिखी है
वो मेरी माँ ही तो काफ़ी है


अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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