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खड़ावदा का घमासान

खड़ावदा में मुक्तिधाम को हुआ घमासान,
हर मोड़ पर छला गया आम इंसान।
छल-कपट के रचे गए यहाँ प्रपंच,
पर इस पूरे प्रकरण से लापता रहा सरपंच।

जहाँ नेता और जनप्रतिनिधि ने जोर दिखाया,
वहाँ बुद्धिजीवियों का मानसिक दिवालियापन छाया।
फिर एक बार ऊपर से दबाव भी आया,
पुलिस और तहसीलदार भी अपना दम-खम लाया।

शासकीय भूमि से कब्जा हटाने की हुई कार्रवाई,
गाँव के लोग अपने-अपने घर को लौटे भाई।
मुख्य जगह आज भी वैसे ही बाकी,
भीतर-भीतर खेल रच रहे प्रशासन और खाकी।

आज तक न मिला खड़ावदा को मुक्तिधाम,
खड़ावदा के विभीषणों को कहो जय श्रीराम।
जो अपनी ही सरजमीं से करते गद्दारी,
उन गद्दारों के आगे आज मानवता हारी।

पर अब नहीं झुकेगा स्वाभिमान,
उठो जवानो करो तुम ऐलान।
भक्त-पुजारी का ढोंग रचाते हैं,
कायरता की चादर में छिप जाते हैं।

इंसानियत को ललकारो, हुंकार भरो,
गद्दारों को कानून से सबक सिखा दो।
जब तक न बनेगा अपना श्मशान,
तब तक चैन से न बैठेगा खड़ावदा का जवान।

कवि – गोपाल जाटव ‘विद्रोही’
खड़ावदा, तह. गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश
मोबा: 9770370192, 9165002920
© सर्वाधिकार सुरक्षित

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