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इश्क का मुकदमा

मैंने हर मोहब्बत की कहानी देखी है,
कोर्ट कचहरी में बदलती ज़िंदगानी देखी है।
वो जो उम्र भर साथ निभाने की बात करती थी,
मेरे हर दर्द में शामिल होने की बात करती थी।

आज वकीलों के कागज़ों में उसकी बेईमानी देखी है,
मैंने इश्क़ की रानी को यूँ बदलती रवानी देखी है।
मेरे कंधे पर हाथ रख जो सफ़र में चला करती थी,
हर खुशी और हर ग़म में साथ रहा करती थी।

आज उसी को कटघरे में बयान बदलते देखा है,
मैंने अपनी मोहब्बत को यूँ रंग बदलते देखा है।
जिसे अपनी दुनिया समझकर सजाया था कभी,
गैरों के इशारों पर चलता पाया है अभी।

जिसके नाम पर लिख दी थी अपनी हर साँस उधार,
आज उसी के हाथों नीलाम हुई तक़दीर देखी है।
वो जो कहती थी तेरा घर मेरा घर है जान,
आज उसी को मकान की दीवारें गिराते देखा है।

कसमों-वादों की फ़ाइल मोटी हो गई है हुज़ूर,
हर तारीख़ पर बिकती वफ़ा की दास्तान देखी है।
गवाहों के कटघरे में खड़ा है मेरा यक़ीन,
और जज की कुर्सी पर बैठी बेरुख़ी देखी है।

वक़ील पूछते हैं क्या सबूत है मोहब्बत का,
मैंने आँखों के आँसू हाज़िर-नाज़िर कर दिए।
वो कहते हैं ये तो पानी है, क़ानून नहीं मानता,
मैंने दिल के ज़ख़्म दिखाए, वो भी ख़ारिज कर दिए।

जज साहब ने हथौड़ा पटका, फ़ैसला सुना दिया,
“मोहब्बत मुजरिम है, उम्र क़ैद-ए-तन्हाई दी जाती है।”
मैंने पूछा हुज़ूर, कसूर क्या था मेरा,
बोले, “दिल लगाना भी जुर्म है, सज़ा तो पाई जाती है।”

अब न कोई अपील, न कोई दलील बाक़ी है,
इश्क़ की फ़ाइल बंद, बस तारीख़-ए-मौत बाक़ी है।
वो जीत कर भी हार गई, मैं हार कर भी ज़िंदा हूँ,
मैंने कोर्ट कचहरी में इंसाफ़ को मरते देखा है।

पर सुन ऐ बेवफ़ा, ये आख़िरी बात सुन ले,
तू काग़ज़ पर जीत गई, मैं दिलों पर राज करूँगा।
तेरे वक़ील गवाह लाएँगे, मेरे आँसू गवाही देंगे,
वक़्त की अदालत में एक दिन तू भी हार करूँगी।

मैंने हर मोहब्बत की कहानी देखी है,
कोर्ट कचहरी में दम तोड़ती जवानी देखी है।
पर इश्क़ मरता नहीं, वो शक्ल बदल लेता है,
मैंने अपनी मौत में भी एक नई कहानी देखी है……।

सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक अधिकार एवं अप्रकाशित रचना

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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