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ग़ज़ल

जीवन में इतना सीखा।
सच को सच कहना सीखा।

फूलों से रिश्ता जोड़ा,
काँटों से बचना सीखा।

थी जितनी कुव्वत अपनी,
दम उतना भरना सीखा।

छोड़ बदी के बहकावे,
नेकी पर चलना सीखा।

मन ने जो अहसास दिया,
तन ने वो सहना सीखा।

भूली – बिसरी बातों को ,
यादों में रखना सीखा।

दूरी, मंज़िल , राहों पर,
सूरज से तपना सीखा।
—- नवीन माथुर पंचोली

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