
प्राकृतिक आपदा है तबाही है
इंसान के पापों की गवाही है
उजड़े हो चमन की बरबादी के गवाह हो
कुदरती विनाश के बनिस्बत छदम विकास के निर्वाह हो
प्राकृतिक संसाधनों पर भौतिक सुविधायें हावी है
स्व अनंत सुखों के खातिर प्रकृति का अनवरत दोहन जारी है
मिट्टी से दूर सीमेंट मे निरंतर खेल रहे है
प्राकृतिक हवा के बदले वातानुकूलित हवा खा रहे है
निज स्वार्थ हेतु निरंतर जमीन का क्षरण हो रहा है
पहाड़ तालाब जंगल नदी नाले सबका विध्वंश हो रहा है
सुविधाओं के विकास मे दुविधाओं का जंगल पनप रहा है
सुविधाभोगी मनुष्य खुद के विनाश का भागीदार बन रहा है
शरीर को छोड़ मशीन को अपना रहा है
पैरों की जगह पहियों को परिचालन की वजह बना रहा है
प्राकृतिक क्षरण मे प्राकृतिक विनाश संभव नही तय है
मत उजाड़ इस नैसर्गिकता को कि अस्तित्व ही तेरा एक विस्मय है
भूकंप भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदा इंसानी उद्दंडता का दुष्परिणाम है
मिट्टी का शरीर है मिट्टी मे ही मिलना है क्रांकिट मे तब्दीली ही मुर्खताई निशान है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













