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खोई हुई रवानी

एक कहानी लिखना चाहता हूँ,
इस शहर की बदलती निशानी लिखना चाहता हूँ।

जहाँ प्यास से तड़पकर मर गए दो परिंदे,
मैं उसी शहर के लोगों की मेहरबानी लिखना चाहता हूँ।

कैसे पत्थर हो गए हैं दिल यहाँ,
बस वही दर्द की ज़ुबानी लिखना चाहता हूँ।

जो कभी मोहब्बत और रहम से आबाद था,
आज उसी शहर की वीरानी लिखना चाहता हूँ।

हर चेहरे पर मुस्कान तो है, पर दिलों में सन्नाटा है,
मैं इस झूठी खुशहाली की कहानी लिखना चाहता हूँ।

जो इंसानियत की प्यास भी न बुझा सके,
मैं ऐसे दौर की नादानी लिखना चाहता हूँ।

कुछ लोग महलों में चैन से सो गए,
मैं फुटपाथों की बेबसी और रातों की परेशानी लिखना चाहता हूँ।

जो शहर कभी अपनों की धड़कनों से ज़िंदा था,
आज उसी शहर की खोई हुई रवानी लिखना चाहता हूँ।

R. S. Lostom

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