
प्रेम के ढाई अक्षर लिख लिए हैं मैंने,
जीवन जीने के लिए गीत लिख लिए मैंने।
स्याही से कागज़ पर नाम तुम्हारा टाँका,
हर साँस के संग तुम्हारे जीत लिख लिए मैंने।
लोग कहते रहे, ये तो पागलपन है,
पर मैंने विरह के भी संगीत लिख लिए मैंने।
रात ने पूछा, क्यों जागते हो अब तक,
मैंने कहा, नींद के भी अतीत लिख लिए मैंने।
पर तुम बिन हर शब्द अधूरा लगता है,
इसलिए अब मौन के भी मीत लिख लिए मैंने।
जब देह मिटेगी, शब्द रह जाएँगे,
कण-कण में तेरे लिए प्रीत लिख लिए मैंने।
पवन से कह दिया, ले जा संदेश मेरा,
धूल के हर कण में पुनीत लिख लिए मैंने।
दीप बुझ गए, पर लौ जलती रही,
अँधियारे में भी उजले प्रतीत लिख लिए मैंने।
जग ने ठुकराया, तो क्या हुआ,
मैंने एकांत के भी मनमीत लिख लिए मैंने।
‘अमन’ अब थक कर बैठा है राह में,
पर अंत तक तेरे ही गीत लिख लिए मैंने।
पग की बेड़ी बनी जब यादें तेरी,
मैंने चलने के ही नवीत लिख लिए मैंने।
सूखा सावन देखकर बादल रो पड़े,
पर मैंने नैनों के भी सुमीत लिख लिए मैंने।
समय ने पूछा, क्या पाया अंत में,
हँसकर कहा, घावों से ही जीत लिख लिए मैंने।
चिता की अग्नि जब देह को छुएगी,
मैंने कहा, राख से भी प्रतीत लिख लिए मैंने।
कलम टूट गई, स्याही सूख गई,
पर साँसों से ही तेरे लिए गीत लिख लिए मैंने।
जग में तेरा-मेरा नाम न रहेगा,
पर शून्य में भी तेरे ही प्रतीक लिख लिए मैंने।
‘अमन’ अब मौन की गोद में सो गया,
पर अंत के बाद भी नवीन प्रीत लिख लिए मैंने।
मौन की गोद में जब आँख लगी,
स्वप्न में भी तेरे ही संगीत लिख लिए मैंने।
काल ने आकर द्वार खटखटाया,
मैंने कहा, युगों के ही अतीत लिख लिए मैंने।
तारों ने पूछा, कौन हो तुम,
धूल बनकर भी पुंजीभूत प्रीत लिख लिए मैंने।
नदी सूख गई, पर्वत झुक गए,
पर हृदय पर तेरे ही वशीत लिख लिए मैंने।
वेद पुराण जब मौन हो गए,
मैंने साँसों से ही नए सुभाषित लिख लिए मैंने।
ईश्वर ने पूछा, क्या माँगते हो,
कर जोड़कर बस तेरे ही आशीष लिख लिए मैंने।
स्वर्ग ने कहा, द्वार खुले हैं,
मैंने कहा, द्वार पर तेरे ही प्रतीक्ष लिख लिए मैंने।
नर्क ने बुलाया, भय न लगा,
क्योंकि वहाँ भी तेरे ही सुभीत लिख लिए मैंने।
प्रलय आई, सब कुछ बह गया,
पर जल पर भी तेरा ही अक्षर अंकित लिख लिए मैंने।
सृष्टि फिर बनी, जीव फिर जन्मे,
हर कण में फिर से तेरे ही चरित्र लिख लिए मैंने।
कल्प बीते, युग बदले,
पर न बदले जो, वो पवित्र प्रीत लिख लिए मैंने।
‘अमन’ अब कण-कण में बिखर गया,
पर हर कण ने कहा — हम तेरे ही मीत, लिख लिए हमने।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)













