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रेत, दरिया और किनारा

रेत —
सिर्फ रेत नहीं होती,
वह टूटे हुए समय की राख़ होती है
उन सपनों की धूल
जिन्हें हवाओं ने
अपनी मनमानी में उड़ा दिया,
उसके हर कण में
एक अधूरी कहानी अटकी रहती है,
जैसे किसी ने
रोते-रोते
अपना नाम मिटा दिया हो,

दरिया —
सिर्फ पानी नहीं होता,
वह बहता हुआ विरह है,
एक ऐसी आवाज़
जो बोलती तो है
पर किसी सुनाई नहीं देती,
वह पहाड़ों से निकलता है
अपने भीतर हजारों स्मृतियाँ लेकर
और समुद्र तक पहुँचते-पहुँचते
कितना कुछ खो देता है —
कोई नहीं जानता,

किनारा —
सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं,
वह प्रतीक्षा का दूसरा नाम है
वह थामे रहता है
हर आती-जाती लहरों को,
जैसे कोई बूढ़ा पिता
देर रात तक
खुला दरवाजा लिए बैठा हो
वह जानता है
कि दरिया ठहरेगा नहीं
फिर भी हर बार
अपनी बाहें फैलता है,

रेत, दरिया और किनारा —
तीनों मिलकर
जीवन का सबसे पुराना सत्य
कहते है —
जो बिखरता है,
वह भी किसी पीड़ा से भरा है,
और जो चुपचाप ठहरा है,
वह सबसे अधिक
प्रेम करता है…

डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा ‘
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश

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