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हे पिता

हे पिता, तुम जब तक थे,मैं नींद चैन की सोता था।
अपनी मर्जी का मालिक था,अपने दादू का पोता था।

तुम घनी छांव के बरगद थे,कौआ,तोता सुस्ताते हैं।
जामुन का स्वाद कसैला है,खग खाते नहीं अघाते हैं।
आयुर्वेद की औषधि से,मधुमेह किनारा कर जाता।
वैसे ही पापा तुम्हें देख, मेरा दुख दूर भाग जाता।

मुझे याद हैं वे पल मीठे, बन तुरंग झुक जाते थे।
कभी पीठ पर कभी पेट पर, झूला खूब झुलाते थे।
सहज सरल सी शिक्षाएं,गंभीर पलों में देतीं संबल।
तभी खड़ा हूं पैरों पर, जीवन मेरा हो गया सफल।

तपिस भरे सोलर जैसे,अद्भुत विद्युत बन आते थे।
फली बीज को ढक लेती,ऐसे हम आश्रय पाते थे।
मैं चांद सा प्यारा बेटा था,मांग चांद की करता था।
भर दी झोली आशीषों से, सपनों जैसा रिश्ता था।

जब भी आप डांटते थे,सुन कर मैं हो जाता मौन।
कंटक राहें सरल बना दीं,सीख भरोसे की अछौंन।
परिवार का इंजन हैं पापा,शक्ति दे उसे चलाते थे।
मां के मांथे के राजमुकुट ,संकट में हमें बचाते थे।

इंजी. रघुराज सिंह कर्मयोगी

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