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आदित्य शत्रु नहीं मैंने बनाया है

मन में पूरा विश्व समाया हुआ है,
पर भीड़ में कोई दिखता नहीं है,
यहाँ सामान्य व्यक्तित्व कहाँ है,
हर चेहरे के पीछे छिपा चेहरा है।

इस घोर कलयुग में गुरु कम,
गुरु से छलावे ज्यादा मिलते हैं,
तभी तो इस जमाने में गुरु गुर
और शिष्य मिष्ठान्न बन जाते हैं।

सच के सिवा सब कुछ होता है,
सच के पीछे झूठ छिपा होता है,
सच बोलना मूर्खता माना जाता है,
फिर भी सच सामने आ ही जाता है।

मेरी सबसे बड़ी शुभचिन्तक
मेरी आत्मा और अंतरात्मा है,
मेरे अंदर से आवाज़ आती है,
सही लगता है वही बोलती है।

इस कलयुग में न मित्र है कोई,
नहीं कोई अपना या पराया है,
दोस्त नहीं है यहाँ यदि कोई मेरा,
आदित्य शत्रु नहीं मैंने बनाया है।

डा० कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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