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प्रभाती वंदन के साथ चंद दोहा मुक्तक

रूप दिगंबर धार के, शंभु बसे कैलाश।
डम-डम डमरू बाजता, स्वर गूंँजे आकाश।
गले वासुकी माल है,चंद्र विराजे शीश,
जो आता प्रभु द्वार पर, करते नहीं निराश।।

नित्य करें जो साधना, करके योगाभ्यास।
काया रहे निरोग है, मिटे सकल संत्रास।
चित्त वृत्ति एकाग्र कर, नाम जपे ओंकार,
ऐसे भक्तों की सदा, पूर्ण करें शिव आस।।

ध्यान भक्त का नित रखें, मदद करें भरपूर।
जो भी आता है शरण,दुख करते हैं दूर।
सहज सरल अति शंभु हैं,जग के पालनहार,
जिस पर करते हैं कृपा, होता वह मशहूर।।

द्वेष-दम्भ से दूर रह,जपो शंभु का नाम।
संस्कारों से युक्त हों,सभी जगत में काम।
भक्तों पर करते कृपा, जो करता नित ध्यान,
जीवन उसका धन्य हो,हृदय बने सुख धाम।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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