
योग प्रवेश करे हर घर में
खुशहाली हो हर जन मन में
काया तंत्र क्रिया मजबूत बने उद्देश्य योग का
थके बिना रुके बिना चलने में सुख है तन का
चरैवेति चरैवेति परम लक्ष्य बने जन मन का
परिश्रमी ही मधुर फल चख पाता जीवन का
योग क्रिया आरोग्य वरदान ऋषि मुनियों का
प्रकृति प्रदत्त साफ हवा मे श्वास प्रश्वास लेकर अनुलोम विलोम क्रिया कई बार अपना कर
स्वास्थ्य रहें श्वसन तंत्र हर अंग पुष्ट बना कर
गृहस्थी के लिये हठ नही सरल योग चुनकर
विश्व मान चुका है योग से नही कुछ बढकर।
हमने तो जन्म लेते ही योग साधना अपनाई थी
पैदा होते ही दाई मां के हाथों कई थपेडे खाये थे
मालिश और तपन को हमने बचपन से पाया था
स्कूल में सजा मिली उठक बैठक खूब लगाया था
दौड लगाना खेल खेलना योग अंग में आते हैं
बडे हुये सब छोडछाड विमुख योग हो गये हैं
नित नियमित योग कर रखें स्वयं को तंदुरुस्त
यह अनत गुणों की खान है जिसने लिया परख।
गोवर्धन थपलियाल












