
सूरज सा है, अक्स तुम्हारा |
तुमसे ही है, जीवन में उजियारा |
तुमसे ही होता है, हर दिन सबेरा |
तुम बिन छा जाता है, हर तरफ अंधेरा |
तुमसे ही रहता, जीवन का बसेरा |
तुम बिन रहता दु:खों का डेरा |
पिता और सूरज की गर्मी, दोनों होती एक समान |
पिता तो है मानो जिंदगी में जैसे कोई कमान |
कमान बिन तीर है अधूरा |
कमान के रहने से ही, लक्ष्य पर निशाना लगता पूरा |
जब तक सूरज की तपन को न सहते हम |
तब तक उसके उजाले को न समझ पाते हम |
पिता का साथ जैसे कोई बरगद के वृक्ष की छाया |
उन्होंने ही जीवन की तपन से हमें बचाया |
हर पल शीतलता का एहसास हमें कराया |
तूफानों को सहकर भी अडिग रहना उन्होंने ही सिखाया |
आज फादर्स डे जो है आया |
मंजू ने लेखनी के माध्यम से कुछ कहने का मन बनाया |
पिता क्या है यही हमने बताया |
जिसकी परिभाषा समझाना नहीं है इतना आसान |
पिता शब्द ही है अपने आप में बहुत महान ||
स्वरचित
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)












