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ध्यान

पढ़कर किताब
करोगे क्या दोस्त
दिल को तुमने
पढ़ा ही नहीं,
आरती थाल
सजाकर करोंगे क्या
सांवरे की मूरत को
दिल में गढ़ा ही नहीं।
दुनिया का मेला भी
गजब है निराला
शिखर पर बैठे प्रभु के
दर तक तू चढ़ा ही नहीं।
मंदिर में जाते ही
ध्यान है पनही पर
भगवान की सूरत को
मन में मढ़ा ही नहीं।

कवि संगम त्रिपाठी

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