
ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष में,
पावन तिथि यह आती है,
निर्जला एकादशी भक्तों को,
हरि-भक्ति पथ दिखलाती है।
जल का त्याग कर श्रद्धा से,
व्रत का पालन किया जाता,
मन के विकारों को हरकर,
आत्मबल इसमें बढ़ जाता।
धर्म, संयम और साधना का,
यह अनुपम उत्सव कहलाता,
विष्णु चरण में ध्यान लगाकर,
जीवन सफल बनाया जाता।
भीमसेन ने व्यास वचन से,
इस व्रत को स्वीकार किया,
एक दिवस के इस उपवास ने,
सब व्रतों का सत्कार किया।
दान-पुण्य का विशेष महत्व,
इस दिन शास्त्र बताते हैं,
जल, फल, वस्त्र और अन्न दान से,
शुभ फल जन-जन पाते हैं।
निर्धन, दुखियों की सेवा करके,
मानव धर्म निभाया जाए,
दया, प्रेम और सद्भावों का,
सुंदर दीप जलाया जाए।
यह व्रत केवल भूखा रहना,
मात्र नहीं उपदेश देता,
सत्य, शुचिता और सदाचार का,
पावन संदेश सदा देता।
निर्जला एकादशी की महिमा,
वेद-पुराणों में गाई है,
हरि कृपा से जीवन में फिर,
सुख-समृद्धि भर आई है।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा सुरभि
मुजफ्फरपुर, बिहार













