
ऐसे ही राम मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहलाते । बचपन से ही जिनका जीवन मर्यादा की झलक रहा था , मर्यादित शब्द प्रयोग , भाईयों से मां समान स्नेह उन्हें भी प्रेम की मर्यादा में बांधे रखा , परस्त्री के लिए मर्यादा की द्रष्टि , जिनके विचार भी आदर्श प्रस्तुत करते हैं , ऐसे ” मर्यादा पुरुषोत्तम ” ” राम ” !!
एक पत्नी-मर्यादा को भी राम जी ने खूब निभाया । अश्वमेघ यज्ञ के समय , मां सीता की मूर्ति साथ में बिठा कर उन्होंने यह साबित किया कि दुनिया की कोई भी मजबूरी इंसान को उसकी मर्यादा भंग करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती ।
अपने बड़ों से ही मर्यादा बच्चों में वसीयत रूप में जाती है ।
मर्यादा सीखाई नहीं जाती आसपास के माहौल से अपने आप हृदय में जन्म लेती है ।
ऐसा क्या हुआ कि एक सिया को चेतन के लिए केतन को मृत्यु के मुँह में धकेलना पड़ा?
कारण अनगिनत हो सकते हैं किन्तु प्रश्न घुम फिर कर माता पिता की परवरिश पर ही उठेगा।
अब समय आ गया है माता-पिता को सावधान होने का, उन्हें बच्चों के मन की बात जानना अति आवश्यक हो गया है। यदि बच्चों के हाव-भाव में कोई भी त्रुटि दिखे तो नजर अंदाज करना ठीक नहीं होगा। बच्चे कहाँ आते जाते हैं इसका पता होना अनिवार्य है क्योंकि उनकी संगत से ही उनके अंतर्मन को परख सकते हैं।
बेटी और बेटे को एक समान रूप से प्यार और छूट के साथ उनके मित्र भी बनें तथा उनकी बातों में यदि बकवास लगे तो भी विचारणीय मानिए क्योंकि वहीं से उनके मन में छिपी भड़ास का सिरा मिल सकता है। याद रखना आवश्यक है हमने बच्चों को जन्म देकर कोई अहसान नहीं किया किन्तु हाँ यदि अच्छे संस्कार दिए हैं तो संसार पर अवश्य उपकार है।
दीपिका मानवानी
गुजरात













