
एक बात बोलूं साहेब,माना कि इंसान में भगवान समाएं होतें हैं,
लेकिन फिर भी हम इंसान ही इंसान को पत्थर मारते रहतें हैं।
फिर भी हम इंसान पत्थरों को देख कर उन पत्थरों पर फूल बरसातें हैं,
क्योंकि हम इंसान जरूरत के हिसाब से किसीको मानतें और न मानतें हैं।
क्योंकि जब तक जरूरत होती है तब तक अच्छी महूर्त होती है,
जब जरूरत खत्म हो जाती है तब अच्छा महूर्त भी खत्म हो जाते हैं।
क्योंकि जरूरत के बिना इंसान न इंसान को भगवान मानतें हैं,
और न ही हर पत्थर को इंसान कभी भगवान मानते हैं।
क्योंकि यह शब्द हमारे जुवां पर तब आता है जब हमारे जीवन में,
कुछ अचानक कोई घटना घटती है और कोई इंसान मौके पर आ जातें हैं।
तब हम कहतें हैं तुम हमारे जीवन में भगवान बनकर आ गए हो,
क्योंकि जो सही समय पर आतें हैं मदद करने को हम उसी रूप में भगवान मनातें हैं
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,













