
आईने सी हूँ मैं,
हर टुकड़े में एक कहानी है,
कुछ सपनों की राख बची है,
कुछ यादों की निशानी है।
हँसती हूँ दुनिया की खातिर,
पर भीतर दर्द समंदर है,
हर धड़कन से पूछो जाकर,
कितना गहरा ये बंजर है।
जिन राहों पर फूल बिछाए,
वहीं काँटों का उपहार मिला,
जिसे अपना समझा था दिल ने,
उसी से सबसे बड़ा वार मिला।
आँखों ने बरसातें देखीं,
मन ने विरह की रातें झेली,
उम्मीदों की डोर थामकर,
फिर भी साँसों की लौ न ढली।
कभी-कभी लगता है जैसे,
सब कुछ मुझसे रूठ गया है,
पर भीतर कोई धीमी आवाज़,
अब भी मुझको छू गया है।
कहती है—
“मत हार अभी, मत थक अभी,
तेरी मंज़िल तुझसे दूर नहीं,
ये दर्द तेरा अंत नहीं है,
जीवन का बस एक दौर यही।”
हाँ, मैं टूटी हूँ, स्वीकार मुझे,
पर मेरी साँसें ज़िंदा हैं,
हर ज़ख्म के नीचे छिपी हुई
कुछ नई उम्मीदें ज़िंदा हैं।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













