
वसुधा का सिंगार है काशी,
ज्ञान ध्यान भंडार है काशी!
बहती जहां गंग की धारा,
जिसका पावन कूल किनारा!
अर्धचंद्र शिव के माथे पर,
बहती चंद्राकार है काशी!!
गायन वादन नृत्य विहंगम,
सुर लय ताल छंद का संगम!
मन को मुग्ध करे स्वर लहरी,
बना हुआ रसधार है काशी!!
गूंज रहा देवत्व जहां पर ,
‘जिज्ञासु’ मन रमता यहाँ पर,
ज्ञान ध्यान भंडार है काशी !
मानवता का सार है काशी !!
शिव को लगती प्यारी काशी,
तीन लोक से न्यारी काशी!
कण-कण में सोहे प्रलयंकर,
अविनाशी दरबार है काशी!!
राग-द्वेष से मुक्त है काशी,
धर्म संस्कृति युक्त है काशी!
कहते हैं आध्यात्म की नगरी,
और मोक्ष का द्वार काशी !!
कमलेश विष्णु सिंह ‘जिज्ञासु’













